मुट्ठी भर सामान नहीं है, आसमान सी फैली आशाएं।
साए से नश्वर इस तन पर, जग ढांपने की अभिलाषाएं।
जिस मंजिल को पाना तय है उस राह में दिखतीं सौ बाधाएं।
मन का भाव सकारात्मक हो तो, सब बाधाएं ख़ाक हो जाएं।
भीतर ज़हर का घोल बना है, अमृत पीने को मन ललचाए।
पर दूषित मन समझ न पाए, ज़हर से दुनिया ख़त्म हुई जाए।
सूखी मिट्टी नम हो बैठी, बरखा भी अपना क़हर बरपाए।
मन का कुम्हार यही सोचे, सावन का भीगा जल्द सूख जाए।
मदिरालय में साक़ी रूठा है, मद्य-प्रेमी को लत तरसाए।
घूंट-घूंट कर सागर पीकर भी, तृष्णा यह तृप्त न हो पाए।
मन की नदिया में नाव सपन की, कोई सुंदर सा ख़्वाब अब आए।
तमाम जीवन उम्मीदों में बंधा है, हर सपना हक़ीक़त हो जाए।
गहरी नींद में खोकर अक्सर, जो सपने पलकों में.सजाए।
सपन की अदला-बदली हो, वो भी यह जज़्बात समझ पाए।
जो बीत गई, वो बात गई अब, भविष्य की हर बात बन जाए।
पूर्णिमा का चांद उदित हो फिर, चांद चकोर का मिलन हो जाए।
मन के आंगन में नन्हा सा पौधा, बढ़कर इक दिन वृक्ष बन जाए।
अंततः सब कुछ माटी में मिलना है, तरु भी माटी में समा जाए।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'