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घरौंदे

Rajeev Ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक महल सा है ये संसार हर देश लगे कमरों से भरे
        
                                                    
                            
देश में इंसान कितने पले सबने अपने अलग घरौंदे धरे

सूरत सबकी कहां मिलती स्वभाव भी किंतु अकिंचन
देखें तो लगे परिवार है हम कितने अलग-अलग पर मन,

सब की चाह और पहचान अनेक झलक से तो सब लगते नेक
मन सबका का किस्से से भरा कितने सारे कौतूहल गढ़ा

जीवन जीते हैं नित्य नए परिवार अपनी चलाने को
जिम्मेदारी को तैयार हैं सब हरेक के बोझ उठाने को

अहं के वचन न बोले कभी उत्साह युक्त हर कार्य उठाने को
जीवन उसी का उपयोगी हकदार वही सब पाने को,


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6 वर्ष पहले
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