डर,
इतना ज़्यादा :(
या,
रहूं खुदसे ख़फ़ा
बुल जाए कुछ...
मन ही मन में
बनते शब्द
आग, द्वेष से
काम पूरा होए...
फिर चैन से बैठूं
क्या क्या हो चुका है...
क्या क्या होना है... मूल्यांकन करूं
सभी के, क़िस्मत से...
कुछ सवाल होंगे...
या, बेचैन मन को नेमतें गिना...
नीचे बिठाल लेते?
कर्त्तव्य करूं!
(आराधना भी ज़रूरी है)
गंत्वय,
तक जाऊं...
और चलने की भी...
ताकत पूरी है
राहुल
.