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कर्म और भाग्य के द्वंद्व में यूँ फँसा हूँ मैं

Rahul Kulkarni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कर्म और भाग्य के द्वंद्व में यूँ फँसा हूँ मैं,
        
                                                    
                            
क्या कर रहा हूँ मैं, और क्या कर रहे हो तुम।
कर्म को ही भाग्य समझूँ,
या भाग्य को कर्म का स्वरूप।
क्या है मेरे वश में,
और क्या है तुम्हारे अधीन।

इसी उलझन में हूँ, प्रभु,
पढ़वा दो मुझको गीता का पाठ।
जो हर संशय सुलझा दे,
जैसे सुलझे थे पार्थ के प्रश्न एक साथ।

ना रहे किसी के मन में बैर,
ना रहे किसी हृदय में पीड़ा।
ना रहे कोई प्यासा जग में,
ना रहे कोई भूखा।

ना रोए कोई माँ अपने पुत्र की
अकारण मृत्यु पर किसी असुर की लापरवाही से।
ना सूखें यूँ कटकर ये वृक्ष,
ना कोई पशु पाए अकारण पीड़ा किसी की बेरुख़ी से।

कर दो सबका कुशल-मंगल, प्रभु,
इस लापरवाह पुत्र को भी सही मार्ग दिखा दो।
भटके हुए इस मन को अपनी कृपा से
धर्म और कर्म का सत्य समझा दो।
2 महीने पहले
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