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पत्ते की जिन्दगी

Raghav Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी
        
                                                    
                            
सूख जब मैं गया फिर हुई ये ठगी
ना ये उपवन हमारा न दुनिया सगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

शाख ने जब गिरा मैं निष्प्राण था
ले गयी फिर हवा मुझको संज्ञान था
चीखता मैं रहा ना ये दुनिया जगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

अपने तन मन को फिर से भिगो ना सका
थोड़ा सुस्ताया लेकिन मैं सो ना सका
मैं जिधर भी गया मुझको ठोकर लगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

रोशनी फिर दिखी मैं उधर ही चला
मुझको मंजिल मिली आग में था जला
बस वहीं थम गई मेरी आवारगी
एक पत्ता कहे सुन मेरी जिन्दगी

- राघव शुक्ल

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