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मानवता, सौहार्द और आत्म-समर्पण

Radheshyam Khatik

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            विचारों की तितली उड़े,
        
                                                    
                            
इस खुले हुए आकाश में।
अधूरी हर ख्वाहिश को,
पूरा करने की आस में!

कल्पनाओं के इस सागर में,
ख्वाहिशों का बहता झरना है।
साँसों को बना डोर प्रेम की,
सौहार्द का रंग अब भरना है!

स्वार्थ-भरे इस दलदल में,
फूल बनूँ मैं मानवता का।
नफ़रत के इस भवसागर में,
इक दीप बनूँ मैं उल्फ़त का!

सर्वत्र तुझको जानकर,
अर्पित हूँ चरणों में तेरे।
भाव मिटे कर्तापन का,
कर्म करूँ सहचर बनकर!

 
एक घंटा पहले
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