कैसा शोभित चंद्र आज नभ में,
मैं इसको देख रही, इसमें तुमको देख रही,
क्या तुम भी मुझको देख रहे होगे?
सूर्य जैसा दीप्तिमान नहीं तो क्या,
कम भी तो उससे है नहीं,
तमिस्रा के इस सघन तम में, आभा फैला रहा यही।
मैं धरा पर देख रही परछाई अपनी,
परछाई में तुमको देख रही,
क्या तुम भी मुझको देख रहे होगे?
गूंज उठी है धरा, कोई कर रहा गीतों की बौछार,
किसने इसको सुर सिखाए, कहाँ से आई नभ में सितार?
मैं सुन रही राग विहाग, विहाग में तुमको सुन रही,
क्या तुम भी मुझको सुन रहे होगे?
यह मुझको देख रहा, मैं इसको देख रही,
मैं धरा पर, यह नभ में, फिर भी मन की बात कह रही,
मैं कह रही बात तुम्हारी, क्या तुम भी मेरी कह रहे होगे?
अर्धरात्रि गई, मैंने पलक झपकाई नहीं,
तुम जाग रहे होगे शायद, इसीलिए अभी तक नींद आई नहीं।
मैं नींद मांग रही इससे, नींद में मांग रही स्वप्न तुम्हारा,
क्या तुम भी मेरा मांग रहे होगे?
नींद भी आई, स्वप्न भी आया, आई मीठी धुन,स
ब मुझको दिख गए, पर कहाँ गए तुम?
मैं व्याकुल होकर बैठ गई, बैठकर तुमको सोच रही,
क्या तुम भी मुझको सोच रहे होगे?
व्योम, चंद्र, धरा, नक्षत्र, सब में ,
दिन-रात आज-कल में,
मैं नेत्र खोलकर देख रही, बंद करके देख रही,
जहाँ देख रही, बस तुमको देख रही,
क्या तुम भी मुझको कहीं देख रहे होगे?
- राधा चौहान