ग़ुलाम बनकर जो रह रहा था,
उसे आज़ाद कराया था।
मत भूलना उन वीरों को,
जिन्होंने देश के ख़ातिर
अपना ख़ून बहाया था।
आज़ाद देश हमें सौंपकर,
उन्होंने मौत को गले लगाया था।
अपने आज की ख़ातिर नहीं,
हमारे आने वाले कल की ख़ातिर
उन्होंने अपना आज मिटाया था।
पर जब-जब आज़ादी की बातें होती हैं,
मैं कुछ ख़ामोश-सी रह जाती हूँ।
कैसे बयान करूँ आज़ादी को,
मैं शब्द नहीं ढूँढ़ पाती हूँ।
आज़ादी की बात सुनकर
बस एक सवाल मन में उठता है—
क्या इस आज़ाद देश में भी
मैं आज़ादी से जी सकती हूँ?
क्या अपने सपनों को चुनने के लिए
अब मुझे किसी की इजाज़त नहीं लेनी होगी?
क्या अब अपनी बातें रखने पर भी
मुझ पर कोई बातें नहीं बनाएगा?
क्या अब मैं अपने फैसले
ख़ुद से ले सकती हूँ?
शायद हमारा देश आज़ाद हो गया,
पर हर इंसान अभी आज़ाद नहीं।
टूट गईं वो गुलामी की ज़ंजीरें,
लेकिन सोच से
हम अब तक आज़ाद नहीं।
हाँ, मेरा देश आज़ाद है...
पर शायद
हम अब तक आज़ाद नहीं।