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शबाब तेरा

prashant gouryan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लिखूँ तेरे शबाब पर एक ग़ज़ल,
        
                                                    
                            
कि जैसे आफ़ताब हैं तेरे नैन-कमल।
अधर तेरे जैसे खिलते गुलाब,
सीना तेरा कोपल-सा कोमल।
मदहोश जाम-सी है तेरी नज़र,
बातें तेरी ऐसी जैसे कोई भँवर।
ये ज़ुल्फ़ें बिखरीं जैसे काली घटा,
आओ जब सामने तुम, तो हो जाए सब क़त्ल-क़त्ल..!
एक घंटा पहले
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