लिखूँ तेरे शबाब पर एक ग़ज़ल,
कि जैसे आफ़ताब हैं तेरे नैन-कमल।
अधर तेरे जैसे खिलते गुलाब,
सीना तेरा कोपल-सा कोमल।
मदहोश जाम-सी है तेरी नज़र,
बातें तेरी ऐसी जैसे कोई भँवर।
ये ज़ुल्फ़ें बिखरीं जैसे काली घटा,
आओ जब सामने तुम, तो हो जाए सब क़त्ल-क़त्ल..!