सात दशक हो चला हैं, इंतजार की घड़ी,
न जाने कब आयेगा, आज़ादी हमारी.
स्वयं में सब उलझे हैं, क्या नेता क्या पीर,
जनता दुखी घूम रही, पुरुष हो या नारी.
पी. के. मंडल.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।