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एक थी बूंद

PRADEEP TRIPATHI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक थी बूंद
        
                                                    
                            
टपकती थी रोज
कठोर पत्थर
के सीने पर।
पर कहां कठोर पत्थर
और कहां मुलायम
कोमल बूंद
जो गिरते ही
खुद बिखर जाती थी
पर वह टपकती रही
प्रति पल,हर पल
प्रति दिन, महीनों,साल
बिना थके,
निरन्तर,लगातार
अनुशासन से
एक लक्ष्य लेकर
फिर एक दिन आया
जब उसने देखा बदलाव
अब पत्थर पर आया था
कुछ ठहराव।
बूंद की निरंतरता ने
विश्वास ने,अनुशासन ने
कठोर पत्थर पर
अपने चिन्ह छोड़े थे
और इस विजय
की कहानी ने
कई मिथक तोड़े थे।
- प्रदीप त्रिपाठी "दीप"
 
10 महीने पहले
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