इश्क का नशा उतार कर बैठा हूं,
मैं अपने दिल को मार कर बैठा हूं।
कहते हैं इश्क में कुछ जाता नहीं अपना,
जिंदगी की बाजी हार कर बैठा हूं।।
पता है दिल है बेदर्द जमाना याद करता है,
वफा बेवफा से मिलने की फरियाद करता है।
पर वो जुमले सुनाकर निकल जाती है गली से,
मेरा दिल है कि बार-बार उसी को याद करता है।।
कौन कहता है तुम हमारी नहीं हो,
प्राइवेट रखता हूं सरकारी नहीं हो।
इश्क निखरकर जिस दिन बाहर आ गया,
फिर मैं यही बोलूंगा की तुम प्यारी नहीं हो।।
मैं खुद को माफ करता ही नहीं हूं,
खुद से इंसाफ करता ही नहीं हूं।
इश्क में इतना दर्द मिल गया है क्या बताऊं,
अब तो अपने साए से भी बात करता नहीं हूं।।
खुद अपनी गलतियां मानने पर उतर आया हूं,
खुद को को लास बनाने पर उतर आया हूं।
मैंने एक गलती करके जीवन को तार-तार कर दिया,
अब तो शांत रहकर कुछ समझाने पर उतर आया हूं।।
-प्रभात सनातनी "राज" गोंडवी