मेरा रूदन,
घर में उदघोष था,
तुम्हारे पितृत्व को जगाने का,
मेरे स्पर्श से,
तुम्हें कोमल हृदय बनाने का,
मेरी मुस्कान से,
तुम्हारे चेहरे पर खिलखिलाहट लाने का,
मेरे कदमों से,
एक नए रास्ते को बनाने का,
मेरे अस्तित्व की पहचान हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
कंधों पर बैठाकर तुमने,
मुझको दर्शन करवाया,
कभी बदंर, कभी घोड़ा बनकर,
मुझे झूला झुलाया,
के खुद घुटनों पर बैठकर,
मुझे अपने पैरों पर चलना सिखाया,
के पीछे दौड़ दौड़कर,
मुझे साईकिल चलाना सिखाया,
मेरे लिए हर किरदार में फिट हुए तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
करूँ नहीं किसी के भी साथ गलत,
संग में ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया था,
अपने हक के लिए आवाज उठाना तुमने ही सिखाया था,
संग में रहोगे हमेशा खड़े मुझे यह भरोसा दिलाया था,
हर खेल में भाग लेना तुमने ही मुझे सिखाया था,
हार में हौंसला और जीत में जश्न मनाना भी सिखाया था,
मेरी कृति के रचनाकार हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
जज्बातों के तूफान समेट कर तुमने,
मुझको मजबूत बनाया है,
रिश्तों में झुककर तुमने,
परिवार को एकजुट बनाया है,
घर की सभी जिम्मेदारी उठाकर तुमने,
मेरा भोझ उतराया है,
मायूसी ना हो मेरे चेहरे पर,
यह उत्तरदायित्व तुमने अपने कंधों पर उठाया है,
मेरे घर की नींव हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
सारी तकलीफें झेलकर तुमने,
सबको महफूज़ किया,
रह ना जाए कोई भी ख्वाहिश अधूरी,
मेरे मन की हर बात को महसूस किया,
खुद फटी कमीज़ पहनकर,
मुझे नए कपड़े दिलवाएं है,
खेलें जितने भी खेल तुम्हारे साथ,
तुमने सभी मुझे जीतवाएं है,
तुम्हारे आगे सब जन्नत भी अधूरी है,
सच है,
पिता है तो सारी ख्वाहिशें पूरी है,
मेरे पूरें हुए अरमानों का नाम हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
बातों में ना माँ जैसी मिठास रही,
चेहरे पर ना कभी खिलखिलाहट,
लाड़की बहुत हूँ मैं, पर,
बोले बोल बस जब तक है हिदायत,
नाजों से पाला तुमने मुझे,
पर हर मुश्किल से लड़ना भी सिखाया है,
संस्कारों और अनुशासन का बीज रोपकर तुमने,
मेरा सर्वस्व बढ़ाया है,
मेरे वजूद की पहचान हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
मेरी माँग को जिद्द, हक और इच्छा माना,
पूरा करना अपना दायित्व माना,
है नहीं कोई भी भेदभाव बेटे बेटी में,
तुमने बस इसी नियम को माना,
बतलाया नहीं, जताया नहीं,
पर फिक्र सबसे ज्यादा करते हो,
पुँँछा जब भी मैंनेंं,
कि कितना प्यार करते हों,
इधर उधर देखकर बस बात काँट दिया करते हो,
मेरी सादगी का परिचय हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम,
समाज के नियम को तुम भी निभाते आए,
चेहरे पर हमेशा संग अपने एक गंभीरी लाए,
मन में भाव छुपे थे लाखों,
पर आँखों से ना दिखलाएं,
इतने कठोर थे नियम इनके,
कि रोती आँखों को भी तुम पोंछ ना पाए,
विदाई के समय सब थे वहीं,
पर आकर गले से तुम मुझे लगा तक ना पाए,
मेरे आदर्शों की परिभाषा हो तुम,
मेरा गर्व, मेरा स्वाभिमान हो तुम।
-पूजल विजयवर्गीय
राजसमंद, राजस्थान
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