सुकून मिलता है तुम्हें देखकर ही,
तुमसे बात हो जाए तो,
मेरा दिन बन जाता है...।
सोचता हूँ तुम्हें रोक लूँ थोड़ा और,
या तुम कहती रहो, "और सुनाओ..."
एक मौन रहे हमारी बातों के बीच,
कुछ तो गुफ़्तगू अंदर ही अंदर हो।
मैं डरता हूँ हर पल कि तुम
अब कॉल कट करोगी...
और तुम जब कहती हो,
"अच्छा, ठीक है... बाय!"
सोचता हूँ, बोलूँ, अभी नहीं,
और तुम कहो, "ठीक है, और सुनाओ।"
मगर डरता हूँ, किस हक़ से कहूँ?
कहीं तुम नाराज़ न हो जाओ।
ये जो होती हैं चंद बातें, फिर
शायद ये भी न कर पाओ।
मैं भी कहता हूँ, मरे मन से,
"ओके... बाय!"
काश, तुम देख पाती
वो मरा हुआ मन...!