सवाल का मेरे, मैंने जवाब पाया आज
ख़ताओं का भी यूँ, सारा हिसाब पाया आज
जो प्यार जिस्म पे सीमित हो, प्यार वो कैसा
है सच्चे प्यार का हमने, अज़ाब पाया आज
पता है प्रेम में, दो जिस्म इक जाँ होते हैं
विवाह बिन तू ने दिल क्यूँ, बे-ताब पाया आज
बखूबी हमने भी, गुमनाम रिश्ते संभाले
पवित्र रिश्तों को ही, कामयाब पाया आज
पवित्र मन में नहीं चाह, तन की होती है
तेरी ही दीद में बस, इक सवाब पाया आज
सनम की दीद ही काफी है, उम्र भर 'पारुल'
सुकून-ओ-चैन उसी में, बे-हिसाब पाया आज