जिसे था अपना सा माना, वो शख़्स मुझको हैरान कर गया है
ख़ता बताए बिना ही, दामन मेरा दुखों से यूँ भर गया है
छवि में जिसकी ही, अपनी छब देखने लगी थी मैं आइने में
किनारा करके वो मुझसे, दिल मेरा तोड़ जाने किधर गया है
हमेशा हर-सू नज़र मेरी, ढूँढती ही रहती है उसको तो अब
वो याद बन ख़ुशबू सा, मेरी इस रग-ए-जाँ में भी उतर गया है
न बदला है ज़ीस्त का ये आलम, ख़ुशी की रुत हो या फिर हो ग़म की
हो रात या दिन, न जाने कैसा ये दर्द, दिल में ठहर गया है
यूँ जीत कर भी शिकस्त ही हाथ आएगी हमको क्या पता था
मेरा तो हर आँसू उस पे शायद, हमेशा ही बे-असर गया है