खाली बैठी निरसता के आगोश में थी
आलस्य ने अपने पंजों में जकड़ा हुआ था
सोचा कुछ लिखकर मन बहला लेती हूं
पर विचार भी कसमसा रहे थे
बड़ी जद्दोजहद के बावजूद भी
जहन में उतरने को राजी न थे
लेखनी भी मायूस सी लग रही थी
जाहिर सी बात है फिर रचना का रूठना तो जायज है
अब भला कहां से एक प्यारी सी कविता रची जाती
आज तो कुछ भी मुक्कमल होने को तैयार न था
आलस्य की इस घेराबंदी का भला हम क्या करते
-सरिता सिंह