बांध वंश को पीठ पर
दांतों से कमान संभॉली थी
लेकर तलवार दोनों हाथों में
झांसी की रानी युद्ध करने उतरी थीं ।
नाको चने चबाने को
अंग्रेजों की खाल उतारने को
वो मर्दानी मैदान में दौड़ी थी
भारत को स्वतन्त्र करने को
लक्ष्मीबाई युद्ध लड़ने उतरी थी ॥
रानी संग जौहर करने को
हजारो वीरांगनाएं भी साथ आयी थी
राख भी हाथ न लगा दरिंदों को
ऐैसी ज्वाला भड़काई थी।
चित्तौण का मान रखने को
खिलजी का गुरुर तोड़ने को
जिन्दा ही चिता पर जली थी
रानी पद्मावती अपने संग
भारत मॉ कि लाज बचाई थी ॥
तलवारो की भीषण टंकारो में भी
दुर्गावती की हुँकार सुनाई देता था
रणभूमि के चारों कोने में
रानी का पराक्रम दिखाई देता था।
बाजबहादुर जैसे शाशकों को
कइयों बार धुल चटाई थी
रानी ने अपने युद्ध कौशल से
मुगलों की नींव हिलाई थी॥
शादी की मेंहदी हाथों से मिटी भी न थी
शीश काटकर चुण्डावत को भेजवाया था
मोह खुद से भंग करने को
पति को विजय श्री दिलाने को
हाड़ी रानी ने अन्तिम निशानी भेजा था ।
माला पहन कर शीश की
चुण्डावत ने हाहाकार मचाया था
औरंगजेब के सैनिको के टुकडे़ टुकडे़ कर
मुगलों को उनकी हद समझाया था॥
कोटी कोटी नमन करता हूँ
भारत कि उन वीरांगनाओं को
जिन्होने ने जान न्यौछावर किया
देश कि मान बचाने को ॥
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें