अब वो प्यार कहां ?
जो अस्सी नब्बे के दशक में था।
एकदूजे से थोड़ा अलग होने पर,
दोनों ओर से चिट्ठी का जमाना था।
तेरे बिन मैं नहीं, मेरे बिन तुम नहीं,
प्यार भरा उद्गार लिखा जाता था।
कई कई बार चिट्ठी को पढ़ते थे,
पढ़ते पढ़ते भी मन नहीं भरता था।
जवाब में फिर चिट्ठी लिखी जाती थी,
यह सिलसिला आने तक नहीं रुकता था।
एक सप्ताह होने पर,
पोस्ट मेन का बेसब्री से इंतजार रहता था।
-चंद्र दत्त शर्मा