संवेदना के शब्दों के साथ संवेदनहीन शासक
छुप गए हैं ओट मे शुन्य बन प्रशासक
सब कुछ प्रत्यक्ष है और सत्ता की है धुंध
असत्य की दौड़ मे छुट गए , गांधी और बुद्ध
सुना है कई कई बार
धरती पर जब बढता है भार
शिव का तीसरा नेत्र
कृष्ण का पांचजन्य
राम का धनुष
भार हल्का करते हैं
और यही हो रहा है
कोई हंस रहा है कोई रो रहा है
युद्ध की विभीषिका नोचे जा रही है
दुनिया अभी भी सोचे जा रही है।।