हर बनते काम में अड़ंगा डाले वो खड़े हैं
मुझे महसूस कराना चाहते हैं, वो बड़े हैं
महज़ दिखावटी तौर पर ही वो सबसे जुड़े हैं
अपनी ग़लत बात भी मनवाने पे वो अड़े हैं
चालाकियों के जंजाल में उलझे वो पड़े हैं
सुधरे नहीं आज तक, लगता है चिकने घड़े हैं
उनको समझाने की कोशिशें तो कई बार की
भौंहें सिकोड़ कर मुझसे कहे, तुमको तो तड़े हैं
- निशांत शुक्ल