भारतीय नारी अबला नहीं सबला होती है
भारत भूमि की वीरांगनाओं का चेहरा
इतिहास के पन्नों में झलकता है
सतयुग का इतिहास खोल
कलयुग के इतिहास से पूछ लो
इतिहास ही गवाह है
सभी इतिहास में निर्णायक चेहरा
स्त्रियों का ही खिला है ।
सतयुग की सती सावित्री धर्म युद्ध लड़ी थी
पवित्रता की सीढ़ी पर खड़ा होकर
आत्मविश्वास से लड़ी थी
अपने पति के प्राण बचाने
जीते जी स्वर्ग की सीढ़ी पर चढ़ी थी
यमराज के चुंगल से पति का प्राण वापस लाकर
सती सावित्री पतिव्रता नारी कहलाई थी ।
द्वापर युग की नारी द्रौपदी
अपनी आत्मसम्मान की बदला में
दुशासन की लहू से अपनी बाल धोयी
तेरह वर्ष की प्रतीक्षा के बाद
अपनी लंबी लटा को बांधी
अपनी आत्मसम्मान के लिए
कौरव कुल का विध्वंस की
अपनी झलकती चेहरा से
महाभारत ग्रंथ रची ।
कलयुग की नारी ना रही पीछे
अपनी आत्मसम्मान के लिए
पद्मावती ने कदम उठाई
अपनी सूरत की एक झलक
खिलजी को ना देखने दी
रानी पद्मावती खिलजी के जिद से लड़ी
सखियों के संग जौहर कर
पत्नी धर्म निभा कर
अपने आत्मसम्मान के लिए
प्राण प्रवाहित की ।
भारत की वीरांगनाएं नारी
सती हीं नहीं
फूटते ज्वालामुखी का रूप में भी दिखी
अपनी आन बान शान से
इस धरती की लाज रखी
झांसी की रानी अपने देश की आत्मसम्मान के लिए
कितने अंग्रेजों को मिट्टी में मिलाई
भारत मां की रक्षा के लिए
अपनी प्राण को गंवाई
भारत की नारी वीरांगना थी
वीरांगना है वीरंगना रहेगी
वक्त पड़े तो अपनी आत्मसम्मान लिए
दुर्गा भी बनेगी । ॥
(रेखा भारती -निर्मल ठाकुर )
(बनासो हजारीबाग झारखंड )
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