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स्वतंत्रता दिवस विशेषांक हेतु मौलिक कविता – “आज़ादी : एक अधूरा सपना”

Nikita Sen

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आजादी यह सिर्फ एक शब्द नहीं है,
        
                                                    
                            
किसी के लिए सपना है।
1947 में अंग्रेजों से आजाद हुए,
पर एक सवाल आज भी दिल में उठता है
क्या सच में हम हर बंधन से आजाद हुए?
अंग्रेजों की बेड़िया टूटी,
पर कुछ बेड़िया आज भी बाकी है।
बाहर से खुला आसमान मिला,
पर घर की दीवारें आज भी ताकतवर साथी है।
तब भी महिलाओं को बेजुबान बनाया जाता था ,
आज भी बनाया जा रहा है,
तब आवाज उठाने पर चरित्र पर दाग लगाया जाता था,
आज भी सवाल उसके चरित्र पर ही उठाया जाता है।
और अगर आज मैं देखूं तो
क्या सच मैं स्थिति इतनी सुधरी है ?
बहुत सी महिलाएं आज भी खामोश रहकर,
अपने ही घर में खुश नहीं है।
पुरुष किसी पराई महिला से बात कर ले तो,
उसका काम या जरूरत समझी जाती है ।
लेकिन लड़की किसी की और नजर उठा कर भी देख ले तो ,
चरित्रहीन बनादी जाती है।
कभी-कभी तो अपने ही मां-बाप के सामने,
वही लड़की गुनहगार साबित कर दी जाती है।
जब बेटियों ने अपनी आवाज उठाई,
अपने हक की लड़ाई लड़ने सामने आई ।
तो अच्छा लगा देख कर की,
आज आज की युवा पीढ़ी चुप रहना नहीं चाहती,
सवालो से डरना नहीं चाहती।
बहुत हुआ मौन तुम्हारा,
तोड़ दो चुप्पी का ताला ।
यह वतन है यह देश है तुम्हारा ,
मत रहने दो अधूरा यह आजादी का उजाला।
अंग्रेजों से आजादी मिल गई ,
अब डर से आजादी चाहिए ,
समाज की बंदिशें से आजादी चाहिए ,
और हर उसे सोच से आजादी चाहिए,
जो कहती है "तुम लड़की हो इसलिए चुप रहो",
क्योंकि 1947 मैं देश आजाद हुआ था ,
अब हर बेटी का मन आजाद होना बाकी है।
7 घंटे पहले
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