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आँखों को अपनी मशाल बनाकर, अपनी ही आस को भीतर जलाकर

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सूरज की आस में सोचा, कब होगा इस कालिमा का निधन,
        
                                                    
                            
इसी सोच में हर पल जागे, कि अब आएगी सूर्य की नई किरण।

हर रात रोते-रोते सोचा, कि कल तो नया सवेरा होगा,
उम्मीद ठहरी, आशा थरथराई, पर सामने वही कल का अंधेरा होगा।

लेकिन एक दिन सामने आई, भीतर से एक नई सच्चाई,
जाना कि रात की कालिमा मिटाने की शक्ति, तुम्हारे ही अंदर समाई।

ठाना उस दिन, माना उस दिन, करना होगा इस परछाई का अंत,
रात देखी ना दिन देखा, बस चल पड़े बनकर, एक जीवंत।

आँखों को अपनी मशाल बनाकर, अपनी ही आस को भीतर जलाकर,
बढ़ चले हैं अब उस पथ पर, इस दुःखों की परछाई को मिटाकर |
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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