सावन में बारिश की बौछारों से
जमी जैसी मुलायम हो जाती हैं
वैसे ही तेरी यादों की बूंदों से
दिल की जमीं नरम हो जाती हैं
ढह जाते हैं दिल की जमीं पर
बनाए हुए बेरुखी के सारे बांध
आंखों से नदियों की धाराएं
धीरे धीरे फिर बहने लगती हैं
-नंदकुमार भागवत