तुम पतंग नहीं एक पंछी बनो, जिसकी डोर किसी के हाथ नहीं !
तुम चाँद नहीं सूरज बनो , जिसकी रोशनी किसी की मोहताज नहीं !
तुम वृछ नहीं पर्वत बनो, जिसपर किसी का अंकुश न हो !
तुम नदी नहीं वर्षा बनो, जिसपर न कोई बांध बने !
हो चरित्र तुम्हारा पृथ्वी जैसा, जिसपर कोई दाग नहीं !
तुम नदी नहीं ये सागर बनो, जिसकी गहरायी न कोई नाप सके !
तुम जिओ तो मिशाल बने, तुम्हारे मृर्त्यु पर ये सारा संसार रोये !
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