घर जाने की खुशी...
मंद मंद मुस्कान आ जाती है,
पुरानी यादों को..
नया बनाने की खुशी में,
कितनी लंबी लगती है रात,
घर जाने की खुशी में।
जुगनू भी सो गए हैं,
आसमान पर किलकारी है,
हर रात से अलग यह रात,
मन पर बहुत भारी है,
दूर आना ही पड़ता है,
यूं बेरुखी में,
कितनी लंबी लगती है रात,
घर जाने की खुशी में।
चंचल मन की मनमानी,
चलती रहती है हर पल,
रात को देखकर दिल कहता है
अभी घर चल, अभी घर चल
घर में रह जाती हर खुशी अपनी खुशी में,
कितनी लंबी लगती है रात,
घर जाने की खुशी में।
पागल बनकर सपने से
सजाए हुए
बीत गया एक अरसा
मां की रोटी खाए हुए,
चलते-चलते आंसू आ ही जाते
अपने आप को मनाने की खुशी में
कितनी लंबी लगती है रात,
घर जाने की खुशी में।।।
- मुकूल कुमार