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वह खूबसूरत नारी

Mukesh Thakur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह वैसी ही है
        
                                                    
                            
जैसे प्रात: की मुलायम धूप
जैसे बादलों से झांकता चांद
शीशे की तरह है मन उसका
अंदर से जैसी, वैसी ही बाहर से।

उसके चेहरे पर मैंने कभी भी
बनावटी हंसी का लेप नहीं देखा
उसके करीब से गुजरने पर भी
कभी ईर्ष्या , द्वेष या जलन की बू नहीं आई
न सुना कभी डांटते किसी बच्चे को
जब वह पढ़ाती है अपनी कक्षा में ।

उसकी आंखें
जिसमें बच्चों सी चंचलता तो है
और है एक तपस्वी की गंभीरता
भावनाओं का प्रतिबिंब समेटे
जैसे छुपाई हो कोई गहरा रहस्य ।

उसकी चाल में
कभी अल्हड़पन नहीं देखा
देखा तो अपने कर्तव्य पथ पर
सदैव गतिशील ।

हां ! उसका चेहरा आकर्षक है
कोई भी आकर्षित हो जाता है उस चेहरे पर
जैसे फूल की पंखुड़ियों पर
शबनम की शीतल बूंदें
आकर्षित करती है अपनी ओर ।

उसकी उम्र मानो थम सी गई है
उसकी घुंघराले बालों की छांव में ।

वह आज भी नहीं बदली है
जैसा बीस साल पहले मैंने देखा था
पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि
उसके जीवन में बदलाव आया ही नहीं
या परेशानियां ने उसे घेरा ही नहीं
पर अपनी मुस्कुराहट के पीछे
छुपाना जानती है वह सारी परेशानियों को
जैसे मर्द अपने सफेद बालों को
छुपा लेते हैं आईना के सामने ।

जीवन जीने की कला सचमुच
हमें उससे सीखना है
जिस हाथ से वह चूल्हा- चौका, बर्तन - बासन करती है
सास- ससुर, पति, बच्चों की देखभाल करती है
उसी हाथ की उंगलियों का चॉक
ब्लैक बोर्ड पर विद्यार्थियों के भविष्य को संवारता है ।

वह एक खुली किताब है
जिसके हर पन्ने पर लिखा है
उसकी मशक्कत और खूबसूरती के किस्से ।

वह केवल खूबसूरत नारी ही नहीं है
वह मां है, वह बहन है, वह पत्नी है, वह बहू है ,वह सखी है , वह बेटी है ।
मानो हर रिश्ते को अपने अंदर समेटी है ।
एक वर्ष पहले
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