सफर ज़िन्दगी का जीने लगे हैं
रह रह के आंसू पीने लगे हैं
बहुत चाहते हैं मिले अपनो से
मगर सड़क लम्बी हो चली है
कैसे करे कोशिशें और कितनी
अपनो से रुस्वा होने लगे हैं
अपने ही दिल को चुभोने लगे हैं
इबादत से अब दूर होने लगे हैं
सफर ज़िन्दगी का कटता नहीं है
अब तो शिकायत मुद्दा नहीं है
जीवन का चर्चा कब तक चलेगा
अपनों से दिल कब तक लडेगा
ये दुस्वारियां कब होंगी खत्म
मेरे रब मुझे अपनों का सिला दे
मुझसे मेरी खुश नीयत को मिला दे
माँ की दुआ से मुझको मिला दे
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