सिर्फ़ तस्वीरों में अगर अच्छी लगी तो क्या ही लगी ज़िंदगी
जो टुकड़ों में जीनी पड़ी तो टुकड़ा टुकड़ा ही जी ज़िंदगी
हर हँसी के पीछे अगर सोने की गिन्नी लगी तो क्या ही संजोई ज़िंदगी
हर सपने के लिए जो टटोले जेब तो क्या ही कमायी ज़िन्दगी
सुकून की हवा चैन की धूप आँगन कभी आई नहीं तो क्या घर ही बनायी ज़िंदगी
टिमटिमाती दिए जो भायी नहीं तो क्या ही जगमगायी ज़िन्दगी