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समर्पण

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भावों में बह कर
        
                                                    
                            
भावों से तुम्हें
पाना चाहता हूं
भावना के क्षितिज पर
मन के पंखों से
उड़ान भरकर तुम्हें
पाना चाहता हूं
नींद बनकर
सो रहे हो
न जाने कब से?
स्वप्न बन कर! तुम्हें
जगाना चाहता हूं।

तुम्हारी वेदना को
ह्रदय के प्रेम रस से सींचकर
तुम्हें हरना चाहता हूं
तुम्हारे अवसादों से
भरे तिमिर बंध को
रवि की स्वर्णिम किरणों से
भेदना चाहता हूं

हे देव ! देवों के देव महादेव
भर देना मुझमें
अथाह शक्ति
अपरिमित सा
मैं खोकर भी
तुम्हें पा लेना चाहता हूं
मैं खोकर भी तुम्हें
पा लेना चाहता हूं
पा लेना चाहता हूं।
3 वर्ष पहले
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