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प्रकृति

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रकृति
        
                                                    
                            
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चपल ,चंचला , चंचलिनी
निर्जन वन में घूम रही
उन्मुक्त, स्वछंद, स्वतंत्र
होगी वह और कौन?
अवश्य होगी वह शीतल समीर
जो बह रही होगी
निर्बाध , निरंतर हो कर मौन
निर्बाध, निरंतर, हो कर मौन।।

प्रकृति के विशाल प्रांगण में
विचरता कौन नहीं?
नवल प्रेम का हार
प्रकृति का पहनता कौन नहीं?
प्रकृति में नहीं है
कोई कोमल और कठोर
क्या पर्वत , क्या झरने
खड़े और बह रहे हैं, मौन
उसके विशाल प्रांगण में
विचरता कौन नहीं?

कमल ,अरविंद, सरोरूह
खिल रहा सरोवर में
रवि किरणों को चूम कर
सुशोभित हो रहा कानन में
चंपा, चमेली और परिजात
खिल कर मौन
खिल कर मौन।

प्रकृति के व्यापकता में
यद्धपि रहते सभी मौन
लेकिन प्रकृति के अंतर अनुनादों से
गुंजरीत होता नहीं कौन?
गुंजरीत होता नहीं कौन?

- मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
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