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चरखा या पिस्तौल

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दोनों चले
        
                                                    
                            
अपने अपने पथ
परंतु ,उद्देश्य न थे
अलग अलग
मार्ग भले ही
दो भावों के थे
लेकिन उद्देश्य थे, एक
आजादी पाना
था, अंतिम ध्येय
इससे कुछ कम नहीं
इससे कुछ कम नहीं।।

साबरमती के संत ने
सत्य , अहिंसा, सत्याग्रह को
आंदोलनों का हथियार बनाया
करो या मरो का नारा दे कर
भारत छोड़ो आंदोलन चलाया।।
भीषण था संघर्ष, उठा मन में था
तूफान समग्र, भय से भरे ब्रितानी
अब शासन करना न रह गया था, सहज।।
एक भाव था, सत्य का
पथ था, अहिंसा
दूजा था, हर मूल्य पर
मिले स्वतंत्रता,नई पीढ़ी ने
शपथें ले कर, उठाई पिस्तौलें
भारत की जय बोल
इंकलाब जिंदाबाद का नारा
बना सबका मोहक गीत
हंसते हंसते चढ़ गए फांसी पर
न जाने कितने आजादी के दीवाने
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव
चढ़ गए फांसी रावी नद के तट
बोस के नारों से मच गया शोर
लगा इंकलाब के अमर बोल
हमने तो चुना है, पिस्तौल
क्रांति की जय बोल
क्रांति की जय बोल।।


- मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
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