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गलत होकर भी...

Manoj B

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गलत होकर भी अकड़ में जो मुक़ीम बैठे हैं,
        
                                                    
                            
अपने अहंकार को, अपना खुदा मान बैठे हैं।

हम ही सच होके ख़ाक में मिल गए,
कि जलते हुए चिराग़ को, हवा न लगे कहीं।

वो समझे कि ख़ामोशी हमारी शिकस्त है,
जो झुक जाए मज़ार पे, वो क्या पस्त है?

अब न तकरार की तलब, न सफ़ाई का मक़ाम,
"फ़कीर" अपनी रज़ा में मस्त, ख़ुदा को सलाम।

हक़ अपनी जगह पे क़ायम रहेगा सदा,
यह फ़क़ीरी न झुकेगी, न करेगी कोई गिला।

- मनोज भटकर 
11 घंटे पहले
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