बारिश की बूँदों में
सिहरती हवाएँ
गरजते बादलों से
आने लगी सदाएँ
भूली बिसरी बातें
फिर से सताएँ
क्यों ना चाय के धुएँ में
यादें उड़ाएँ।
- मं शर्मा (रज़ा)