एम.ए. हिंदी पास किया, बी.एड. का भी पर्चा भुनाया,
ममता मनु ने शिक्षा का, पूरा खाता-बही बनाया।
पढ़ने में थीं 'ठीक-ठाक' वे, व्याकरण सब रट डाला था,
पर नियुक्ति के दरवाजे पर, लगा हुआ भारी ताला था।
रस, छंद, अलंकार पढ़े सब, कबीर-सूर को घोल पिया,
बी.एड. की फाइल संग लेकर, लेमिनेशन से जाम किया।
विज्ञापन जब-जब आता था, दिल में आशा जग जाती थी,
परीक्षा देकर लौटतीं, तो पेपर लीक की खबर आती थी ।
पढ़-लिखकर बेकारी ढोना, आधुनिकता का अनुपम उपहार है,
ममता मनु की योग्यता पर, पूरी व्यवस्था का तीखा प्रहार है।
पिता पूछते— 'कब लगेगी टीजीटी की सरकारी नौकरी?',
रिश्तेदार ताना मारते— 'घर में खाली बैठी है छोकरी!'
फॉर्म भरने की फीस में ही, खत्म हुआ बचत का धन,
एम.ए. की डिग्री हँसती है, बी.एड. रोता है रात-दिन।
साहित्य का सारा ज्ञान खो गया, इस बेकारी के रोने में,
सपनों का महल ढह गया, बेरोजगारी के कोने में।
सरकारी विज्ञापनों में, केवल पदों के छलावे आते हैं,
योग्यता के दावेदार यहाँ, दर-दर की ठोकरें खाते हैं।
ममता मनु का ज्ञान विशाल, पर जेबें पड़ीं खाली-खाली हैं,
शिक्षक बनने की चाहत में, हाथों में थमी बस थाली है।
इस रचना को लिखते उसके लरजते होठों की स्याही है,
एक हाथ में कलम तो दूजे में घर की जिम्मेवारी है।।
-ममता मनु