फर्क बेटा बेटी में अक्सर ये कर जाती हूँ मैं
फर्क बेटा बेटी में अक्सर ये कर जाती हूँ मैं
बेटी को ज्यादा, बेटे को प्यार कम कर पाती हूँ मैं।
बेटी है पराया धन यही सोच अकुलाती हूँ मैं
समानता के नारे को सही में झुठलाती हूँ मैं।
आज भी नारी दहेज वेदी पर
अग्नि भेंट कर दी जाती है।
इज़्ज़त मान मर्यादा की खातिर
लड़की की ही जान जाती है
मायका छोड़ ससुराल जाती है
दूजे घर की ही कहलाती है।
सारी उम्र निभा जाती है,
नाम कहीं नही वो पाती है।
कुछ को छोड़ कर कहानी सबकी बताती हूँ मैं,
प्यार जहां का सारा बेटी पर लुटाती हूँ मैं।
फर्क बेटा बेटी में अक्सर ये कर जाती हूँ मै।
साक्षर होने का बोझ भी
नारी ही उठाती है,
घर बाहर दोनों की
ज़िम्मेदारी निभाती जाती है
अपने लिए ही समय,
वो निकाल नही पाती है।
उस नारी की व्यथा गाती हूँ मैं
बड़े प्यार से इसे बहुत कुछ समझती हूँ मैं।
फर्क बेटा बेटी में अक्सर ये कर जाती
हूँ मैं।
आज भी अधिकार प्यार का
पाने को वो तरस जाती है,
पुरूष प्रधान समाज मे नारी
'ना' का दंड पाती है।
'ना' जो वो कह जाती है,
ज़ख़्म तेज़ाब के चेहरों पर पाती है।
देख क्रूरता समाज की डर सी जाती हूँ मै।
कैसे चलना है जीवन में उसे सिखलाती हूँ मैं।
दिखे ना उसको ,आँखों मे पानी भर लाती हूँ मैं
फर्क बेटा बेटी में ,अक्सर ये कर जाती हूँ मैं।
कितना भी कहो नारी स्वतन्त्र है
पर क्या सच में नारी स्वतन्त्र है?
यही समानता का बोझ उठाती हूँ मैं।
फर्क बेटा बेटी में अक्सर ये कर जाती हूँ मैं,
बेटी को ज्यादा,बेटे को प्यार कम कर पाती हूँ मै।
- ममता खुराना