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भीड़ भाड़ की इन सड़को पर

Lara Upadhyay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अजनबी
        
                                                    
                            
भीड़ भाड़ की इन सड़को पर
कोई अनजाना मिल जाता है
जान न पहचान कोई उससे पर
क्यों अपना -सा लग जाता है

थोड़ी-सी मुस्कान लिए होठों पर
कोई अफसाना -सा लगता था
उसकी इन खामोश निगाहों से
क्यों कोई अतीत जग जाता था

ना कोई रिश्ता , ना कोई पहचान
कोई उससे जुड़ाव-सा लग जाता हैं
फिर अजनबियों की इस दुनिया में
क्यों इतना करीब वों हों जाता हैं

क्षण भर जीवन के संग चला
बीच राहों में फिर यू खो गया
जैसे सुखे पत्तों सा,
हवा संग वों कहीं बह गया

पर उसकी उन शांत निगाहों में,
एक प्रश्न ठहर जाता है—
क्यों हर अजनबी इस दुनिया में
अपना-सा लग जाता है?
~लारा उपाध्याय
11 घंटे पहले
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