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"सिफारिश-पुराण"

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिफ़ारिश का महामंत्र है,
        
                                                    
                            
भाई-भतीजा राजतंत्र है,
बिन पर्ची के इस दुनिया में,
हिलता नहीं कोई यंत्र है।

योग्यता खड़ी है द्वार पर,
उसे कोई पूछता नहीं,
चापलूसी बैठी गद्दी पर,
योग्यता को चुनता नहीं।

मोटर का सौदागर अब,
रक्षा-सौदा करने लगा है,
बाइक का ठेकेदार अब,
मिसाइल खरीदने लगा है।

जीवन भर जिसने कभी,
दो तार के दर्शन न किए,
उसे संचार-क्रांति का,
भाग्य-विधाता बना दिया।

सटोरिया पुल बनाता है,
पुल दरकते सदा रहते हैं,
माला फेरने वालों को,
विकास मंत्रालय मिलते हैं।

पेपर लीक की रोशनी से,
अफ़सर के घर दीये जले,
मेहनत की स्याही वाले,
अँधेरी रात में स्वयं पले।

क्रिकेट के 'क' से अनजान,
खेल-परिषद का ताज है,
बल्ला कभी छुआ नहीं,
पर चयन का वही राज है।

अखाड़े की मिट्टी जिसने,
कभी माथे नहीं लगाई,
वही मंच से पहलवानों की,
किस्मत रहा लिखवाई।

कुश्ती के दाँव-पेंच अब तो,
फ़ाइलों में लड़े जाते हैं,
पहलवान भूखे सोते हैं,
चापलूस पदक उड़ाते हैं।

और अब नया अवतार देखो,
एथेनॉल का आया है,
सिफ़ारिशी शुगर मिल वाले को,
हरित-ठेका भाया है।

गन्ने से तेल निकलेगा,
ये सिफ़ारिशी विज्ञान है,
किसान का नाम आगे है,
पीछे सेठ का ध्यान है।

बीस प्रतिशत पानी नहीं,
अब एथेनॉल की धार है,
इंजन भले ही रो पड़े,
ये तो प्रगति की रफ़्तार है।

पहले जो मदिरा बेचते थे,
ठेके ले-लेकर गली-गली में,
वही अब पेट्रोल बेचेंगे,
सिफ़ारिश की लंबी नली में।

माइलेज घटा तो क्या हुआ,
भाषण में बड़ा उछाल है,
गाड़ी अड़े तो अड़ने दो,
आँकड़ों में बड़ा कमाल है।

दिल का मरीज़ स्वास्थ्य संभाले,
शिक्षा में अनपढ़ राज है,
जहाँ देखो वहीं यारो,
सिफ़ारिश का ही तंत्र-समाज है।

ये लोकतंत्र नहीं सखे,
ये सिफ़ारिश का तंत्र है,
जहाँ हर प्रतिभा पर भारी,
एक अदृश्य षड्यंत्र है।

-लक्ष्मण झा ‘परिमल’
 
एक दिन पहले
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