शहर ने बड़े रौब से
अपनी कमीज़ के कॉलर को उठाकर कहा —
"हम शहर हैं!
गाँवों से हम निराले हैं,
हमारी तो बात ही कुछ और है,
हम गाँवों से कहीं बढ़कर हैं।
हम ऊँचाइयों को छू रहे हैं,
सुविधाएँ हमारे कदम चूमती हैं,
बिजली, पानी, सड़क, मकान,
अट्टालिकाओं से माँग सजी है हमारी।
परिवहन का जाल बिछा है
चारों दिशाओं में,
खान-पान में भी हम
बड़ा परहेज़ रखते हैं।
हमें भला किसी से क्या लेना-देना?
हम तो अपनी ही शान में जीते हैं!"
गाँव चुपचाप सुन रहा था,
शांत चित्त, धीर मन से,
यह विवेचना थी,
या अहंकार का गर्जन था?
या अपने ही पूर्वजों की
यह अवमानना थी?
फिर गाँव ने बड़ी शिष्टता से कहा —
"हे नगर-श्रेष्ठ!
हम नहीं करते निरादर
तुम्हारे इस प्रगति-पथ का,
भला कौन रोक सकता है
तुम्हारे इस विजय-रथ को?
सत्य है,
हम सुख-समृद्धि से
आज भी वंचित हैं,
पर हम आज भी
अपने समाज से जीवंत जुड़े हैं।
यहाँ विपदा यदि
भूल से भी किसी द्वार आ पड़े,
तो सारा गाँव उमड़ पड़ता है,
एक ही आँगन बन जाता है।
उसकी पीड़ा,
सबकी पीड़ा बन जाती है,
उसका शोक,
सबका मौन बन जाता है।
जिस दिन उसके चूल्हे नहीं जलते,
उस दिन कोई अकेला भूखा नहीं सोता,
हम थाल परोसकर
उसे मनाने चले आते हैं।
सहयोग का अमृत
अभी भी हमारी नसों में बहता है,
इसी धागे से हम
एक-दूसरे को बुनते हैं!"
अब निर्णय तुम्हें ही करना पड़ेगा,
कौन आगे, कौन पीछे, गुनना पड़ेगा!
न्याय के आसन पर तुम आज हो,
सच क्या है, तुम्हें ही कहना पड़ेगा!
- डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका ,झारखंड