देखो, कल तक मैं बूढ़ा था,
सीनियर सिटीजन कार्ड
और आयुष्मान कार्ड लेकर घूमता था।
योग दिवस में आसन को छोड़िए,
साँस एक बार छोड़ता था
तो वापस नहीं ले सकता था।
आगे-पीछे, दायें-बायें करने से
बिल्कुल परहेज करता था।
फेसबुक के पन्नों पर कभी-कभी
सीनियर सिटीजन की रियायतों को
रेलवे रिजर्वेशन में ढूँढ़ता रहता था।
भूल से कभी अप्पर बर्थ
मिल जाता तो लोगों से
लोअर बर्थ की गुजारिश किया करता था।
ट्रेन यात्रा में यदि कोई
उम्र पूछता तो मैं '75 प्लस' कहता था,
पर ससुराल में अपने को
सदा जवान ही कहता था।
दाँतों का कृत्रिम डेन्चर
बना रखा था,
आँखों पर पावर का चश्मा
लगा रखा था!
हाफ निकर पहनकर
स्टेडियम निकल जाता था,
साइकिल की सवारी में
कुछ अनोखा नजर आता था।
फिर एक दिन मेरी कहानी बदली,
AI से अपनी तस्वीर बदल डाली।
फिल्टर का ऐसा जादू चला,
मुझ बूढ़े में जवान का रूप ढला।
आधार कहे - ये तस्वीर तेरी नहीं,
फेसबुक कहे - वाह, सूरत तेरी ही सही।
लाइक मिले हजार, कमेंट में वाहवाही,
आईना देखूँ तो खुद से ही अनजानाही।
और फिर जो हुआ, सोचा न था -
फिल्टर वाली फोटो देख कर,
नयी-नयी बच्चियों के संदेश आने लगे,
"सर, फ्रेंडशिप कर लीजिए" के प्रस्ताव आने लगे।
पहले तो मन मेरा थोड़ा इतराया,
फिर भीतर से कोई धीरे से मुस्कराया।
सोचा - ये तो बहुत बुरा हुआ,
उम्र छिपा कर छल करना बुरा हुआ।
अब पछताता हूँ, ये कैसी भूल हुई,
जवानी की नकल में असलियत ही गुम हुई।
क्या पाया इस झूठी चमक-दमक से,
रिश्तों की सादगी ही तो छूटी हाथ से।
नकल ने जब असल को पछाड़ा,
अपना ही चेहरा मैंने उजाड़ा।
इतना सँवारा, इतना निखारा,
असल को खोया, नकल को सँवारा।
-लक्ष्मण झा परिमल