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बीज की कहानी, बीज की जुबानी

KULDEEP YADAV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जहां कुचल दिया मुझ बीज को तुमने, उस मिट्टी से मैं पनपा हूं,
        
                                                    
                            
संघर्ष की आग में जला हुआ मैं, अपने लक्ष्य को पाने का जन्मा हूं l

जब धरती मे दफनाया मुझको, न उम्मीद किसीं को थी,
बड ना जाऊ कही मै आगे, यह कोशिश लोगो की थी,
सूखी बंजर उस जमीन मे मुझको , निर्दयता से कुचल दिया,
संबल के नाम पर इस दुनिया ने, हर पल पर मुझसे छल किया l

आशा थी लोगो से मुझको , केवल भावात्मक -मानसिक समर्थन की ,
जो पानी की तरह कर , नम जमीन को, करती नव जीवन का प्रवर्तन भी ,
न रिश्तेदार न कोई व्यक्ति , मुझको प्रेरणा देने आया ,
पर तुलना तानो के वारो से, आत्म विश्वास मेरा गिरवाया ,
तानो... की चोटे खा खाकर, जब बढ़ना मैंने सीख लिया ,
स्वाभिमान की रक्षा में, दर्दो से जूझना सीख लिया ,
बड़ता देख मुझे आगे , कई बार मुझे दफनाया है ,
फिर टूटी पत्ती और तन के संग मैंने , फिर से खुदको अपनाया है l


जीवन पाने की इक तलाश मे, लोगो से साथ की एक आस मे ,
संघर्ष के मेरे अंधकार मे , था ही नही कोई मेरे साथ मे ,
जिद्दी बनके फिर भी मै , पौधे के रूप मे पनपा हूँ,
सीमित संसाधन होने पर भी, नये रूप मे जन्मा हुँ ,
बस मात पिता और ईश्वर के आशीष ने मुझे, बड़ाया है,
और मेहनत करके संघर्षो से, जीतना मुझे सिखाया है,
इक यही विश्वास सहारा था जो, मेरे अंतर्मन मे समा ग़या,
और लक्ष्य को पाने मेरे मन मे, भयंकर तपती ज्वाला जला गया,
और आत्म विश्वशि अडिग बनाकर, मुझे विशाल वृक्ष सा बना गया l

देख वृक्ष की यह विशालता, आज फिर उन लोगो ने मुझे गले लगाया है,
फिर बन ना पाए नया वृक्ष कोई , यह सोच कर जिन्होंने , शायद आज फिर एक नया बीज दफनाया है,
पर भूल रहे ये लोग फिर से, यह नया बीज भी बही दोहराता है,
इसी तरह इन लोगो से मुझको अपना , दफनाया जाना याद आता है l

इसीलिए दोहराकर मै इन लोगो से, मैं बस बार बार यही कहता हूं  कि ,

जहां कुचल दिया मुझ बीज को तुमने, उस मिट्टी से मैं पनपा पनपा हुं
संघर्ष की आग में जला हुआ मैं, अपने लक्ष्य पाने जन्मा हूं l
2 वर्ष पहले
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