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खुले पिंजरे में कैद

Kulbhushan Choudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब तुमने दिल में जगह बनाई याद नहीं आता है,
        
                                                    
                            
मैं तेरी मोहब्बत में कैद बस यही याद आता है,

अब तो आदी हो गई हूं तेरी कैद में रहने की,
कैसे छूटुं तेरी कैद से कुछ समझ नहीं आता है,

भाती है खामोश सिसकियां अब बंद कमरे की,
खुले में भी मन कैद से मुक्त नहीं हो पाता है,

देख खुले आसमां को मन उड़ने को तड़पता है
जैसे एक परिंदा उड़ने को पंख फड़फड़ाता है,

इश्क के पिंजरे में कैद मन कैसे भरेगा उड़ान,
भूल गया परिंदे की तरह कैसे उड़ा जाता है.
 
एक वर्ष पहले
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