रोज रात सोता हूं गुमशुदा सपने ढूंढने के लिए,
नींद भी बेवफा हो गई है रातों की न जाने किसके लिए,
भटकता हूं गैरों की बस्ती में गुमशुदा अपने ढूंढने के लिए,
अपनों ने भी ठिकाने बदल लिए हैं न जाने किसके लिए,
सपने तो मेरे अपने थे, वो भी मुख मोड़ गए,
अब वो किसकी रातें रंगीन कर रहे हैं न जाने किसके लिए,
अपनों की मुहब्बत खींच लाती है रोज़ उस गली में,
लेकिन उस गली का हर दर बंद है न जाने किसके लिए.
- कुल भूषण
29.05.23