विज्ञापन

गुमशुदा जिंदगी

Kulbhushan Choudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोज रात सोता हूं गुमशुदा सपने ढूंढने के लिए,
        
                                                    
                            
नींद भी बेवफा हो गई है रातों की न जाने किसके लिए,
भटकता हूं गैरों की बस्ती में गुमशुदा अपने ढूंढने के लिए,
अपनों ने भी ठिकाने बदल लिए हैं न जाने किसके लिए,
सपने तो मेरे अपने थे, वो भी मुख मोड़ गए,
अब वो किसकी रातें रंगीन कर रहे हैं न जाने किसके लिए,
अपनों की मुहब्बत खींच लाती है रोज़ उस गली में,
लेकिन उस गली का हर दर बंद है न जाने किसके लिए.

- कुल भूषण 
29.05.23
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all