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ग़ज़ल

Krishna Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कच्ची उमर में दिल का मर जाना कैसा होता हैं
        
                                                    
                            
जीते जी कब्र में ख़ुद क़ो दफनाने जैसा होता हैं

तुम कहते हों बेरंगी रहती हूँ शौक नहीं मुझकों
कहीं सुना हैं लाश पे श्रृंगार दुल्हन जैसा होता है

मुझकों आज़ादी हैं अपनाने की शर्त ज़ात ठहरी
ज़ात में मुहब्बत हों हर दफ़ा कहाँ ऐसा होता हैं

महबूब भी मिले और ज़िम्मेदारियां भी पूरी हों
किसी ग़रीब के पास कहाँ इतना पैसा होता हैं

हालात बदल जाते हैं तों पसंद बदल जाती हैं
कोई भी शख्श कहाँ फिर पहले जैसा होता हैं

कृष्णा ने मान लिया करम वगैरह कुछ नहीं हैं
आजकल सुना क्या जैसे के साथ तैसा होता हैं
-कृष्णा शर्मा
4 महीने पहले
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