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वीर सपूत

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                            कविता
        
                                                    
                            

प्रचंड भाल पर हिमाद्रि के, जड़ा जो रक्त-बिंदु है,
उसी अजेय शूर की, गवाही देता सिंधु है।
गगन भी काँप-काँप कर, नमन करे प्रताप को,
धरा भी शीश चूमती, तरुण लहू के ताप को।
अराति-मुंड काट कर, जो मृत्यु से लिपट गया,
वो काल-चक्र की परिधि को, लाँघ कर सिमट गया।
खड़ी निहारती रही, भवानी उसके शौर्य को,
समर भी आज मान बैठा, वीर के औदार्य को।
मगर तिरंग-वस्त्र में, लिपट के जो घर आ गया,
वो शूरवीर गाँव को, श्मशान सा रुला गया।
कलाई का वो रक्षा-सूत्र, चीखता चिता के पास,
बिलखता अनाथ बाल, माँगता पिता की साँस।
वो माँग का सिंदूर, राख से लिपट के रो पड़ा,
पहाड़ का कलेजा भी, व्यथा से आज दो धड़ा।
शहादतों की वेदी पर, ये कैसी अश्रु-धार है?
कि जीत कर भी लग रहा, ये क्रूरतम प्रहार है।
सृजन के बीज जल गए, वो वंशावली भस्म है,
हे राष्ट्र! इस रुदन पे आज, मौन तेरी कस्म है?
लहू की इस पुनीत धार का, हिसाब क्या चुका रहे?
स्वदेश के विभीषणों को, तुम गले लगा रहे!
जो नोचते हैं देश को, वो सर्प पालते हो तुम?
शहीद की चिता की आग पे, सियासतें सेंकते हो तुम?
कि जिनके एक वार से, दिशाओं के भी वक्ष फटे,
उन्हीं के घर में आज क्यूँ, अँधेरों के हैं जाले डटे?
सुनो! ये अस्थियाँ पुकारतीं, कि भ्रांति को उतार दो,
स्वदेश के कलंक को, त्रिशूल से विदार दो।
न रक्त ये निलाम हो, न व्यर्थ ये पुकार हो,
दिलों में आज फिर से एक, नया महाभारत तैयार हो।
उठो! कि आज वक़्त की, यही पुकार है प्रखर,
झुके न भाल देश का, भले कटें सहस्र सर।
पवित्र मातृभूमि पर, लुटा दें प्राण-पुंज को,
'विभूति' राग गा रहा, इसी अखंड गुंज को।
उठो! कि मौन तोड़ दो, हे 'रंज' शंखनाद हो,
कि कायरों के पतन का, अब नया अनुवाद हो।
नमन है कोटि-कोटि, उन हुतात्माओं के त्याग को,
नमन है रक्त से रचे, बसंती अमर राग को।
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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