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तपिश के ये मौसम सजल हो गए हैं

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हारी इनायत का बादल घिरा तो
        
                                                    
                            
तपिश के ये मौसम सजल हो गए हैं
तुम्हारे ही क़दमों की आहट को सुन कर
ये माटी के रस्ते महल हो गए है
तुम्हारी निगाहों के अमृत को पी कर
कि हम आज जल से कमल हो गए हैं

थकी जा रही थी ये साँसों की नैया
भँवर में फँसा था किनारों का सपना
तुम्हारी पुकारें मिलीं जब से हमको
लगा है जहाँ में कोई तो है अपना
तुम्हारे ही माथे की आभा को छू कर
गगन के सितारे धवल हो गए हैं

हृदय के शिवालय में सूना पड़ा था
तुम आए तो गूँजी हैं पावन ऋचाएँ
तुम्हारे ही शृंगार की छाँव पा कर
महकने लगी हैं ये दसों दिशाएँ
तुम्हारी ही बाँहों के घेरे में आ कर
मेरे सारे संशय विफल हो गए हैं

अभी तक जो होंठों पे ठहरी हुई थी
वो चुप्पी भी अब तो तराना बनी है
जिसे ढूँढते थे इबादत में हम सब
तुम्हारी झलक वो ठिकाना बनी है
तुम्हारे ही प्रेम के इस व्याकरण से
ये जीवन के अर्थ अब सरल हो गए हैं

समय की किताबों में जितने पन्ने हैं
वो सारे तुम्हारी ही गाथा कहेंगे
युगों तक ये नदियाँ रहेंगी जहाँ भी
वहाँ प्रेम के नीर बनकर बहेंगे
तुम्हारी इसी एक मीठी छुअन से
हमारे ये वादे अचल हो गए हैं
-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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