साँस चलती रही उम्र ढलती रही
बर्फ जैसे बदन में चिता जलती रही
हाथ जिसने मिलाया कलाई कटी
धूप हिस्से में आई छाँव सारी बंटी
लब सिले ही रहे अश्क सूखे रहे
पीर सीने में चुपचाप पलती रही
बर्फ जैसे बदन में चिता जलती रही
जो दुआ दे गए बददुआ हो गई
जिंदगी खुद से ही बेवफा हो गई
राख का ढेर है और धड़कन का बोझ
मौत भी दूर से हाथ मलती रही
बर्फ जैसे बदन में चिता जलती रही
कोई उम्मीद अब ना किनारा रहा
बस खंडहर सा ये जिस्म सारा रहा
ख्वाहिशें मर चुकीं लोग अपने नहीं
आस टूटी हुई करवटें बदलती रही
बर्फ जैसे बदन में चिता जलती रही
साँस चलती रही उम्र ढलती रही
-भानु शर्मा रंज