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संघर्षों का गीत

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धूप कितनी कड़ी छाँव कितनी घनी
        
                                                    
                            
मैं मुसाफिर डगर पर निकलता गया
मंजिलें दूर थी राह पथरीली थी
गिर के हर बार लेकिन सँभलता गया

आँधियों ने बिछाए थे कितने भंवर
पर कदम मेरे रुकने कभी ना सके
बिजलियों ने डराया बहुत व्योम से
हौसले फिर भी झुकने कभी ना सके
मुश्किलों का समंदर उफनता रहा
मैं लहर दर लहर ही बदलता गया

प्यास से सूख जाते थे मेरे अधर
आंसुओं को ही पीकर गुजारा किया
जब निराशा घनेरी डराने लगी
भोर की किरणों ने ही इशारा किया
वक्त का चक्र हर पल उलझता रहा
मैं नए सांचों में रोज ढलता गया

लोग कहते थे यह पार होगा नहीं
सिंधु गहरा बहुत और तूफ़ान है
मैं हँसा और बोला लहर से यही
इस चुनौती में ही मेरी पहचान है
ज़िंदगी का समर रोज तपता रहा
मैं अगन में निखर कर पिघलता गया

ज़िंदगी एक अनबुझ पहेली बनी
रंज हमने मगर गम ना कोई किया
कंटकों का मुकुट शीश पर धार कर
मुस्कुरा कर गरल भी खुशी से पिया
स्वप्न टूटे मगर मन मचलता रहा
हार को जीत में मैं बदलता गया
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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