मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
मेरो विरह बनै अस पावन रज जहँ पग धरुँ प्रेम बितान जगे
जैसे सिय रघुबर को नेह अमिट भोरी राधिका श्यामल रंग पगे
मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
सिय राम दरस की प्यास जगे नैनन जल भरि भरि कूप बनैं
जहँ जहँ पग धारैं दुखी जनम मोरी श्वास तहां बन छाँह तनैं
कबहूँ न बुझे यह प्रेम अगन रघुनायक छबि हिय माझ खगे
मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
ज्यों सती तजी निज देह भसम शिव शंकर हेत प्रमान दियो
त्यों जरै अहंकर खण्ड खण्ड मैं निज अस्तित्व अवसान कियो
जहाँ तम अज्ञान को छाय रह्यो तहँ मेरो भस्म उजेर डगे
मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
वृषभानु नंदिनी की पीरा जब रोम रोम में बास करै
तब श्याम स्वयं मुरली तजि कै मोरे अधरन पै हास धरै
हर माटी चन्दन रूप लहै हर कुंज गली नन्दन सा लगे
मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
कवि भानु कहे सुनि लेहु हरी उर रंज सु काव्य सजीव बनै
दीनन की करुण पुकार जहाँ मोरी देह तहाँ ही राख सनै
जहँ बहे पसीनो श्रमित जनन तहँ काव्य सुधा रस धार पगे
मोहे देहु दरद अस दीनदयाल सगरी जग पीर सिरान लगे
-भानु शर्मा रंज